विदेशी निवेश पर भारतीय नागरिकों ने रखे अलग-अलग विचार, चीनी निवेश को किया दरकिनार

विदेशी निवेश की बात करें तो औसत भारतीय नागरिक और मतदाता दो प्रकार की सोच रखते हैं। वह इसका भारत के लिए सकारात्मक के रूप में स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही विदेशी निवेशकों से काफी सावधान भी हैं।
आईएएनएस-सीवोटर कंज्यूमर ट्रैकर में सामने आए निष्कर्षो से यह जानकारी मिली है।

अक्टूबर, 2021 के तीसरे सप्ताह के दौरान सीवोटर द्वारा किए गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के दौरान भारतीय नागरिकों के इस दोहरे विचार का पता चला है। चीन और चीनी निवेश ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र रहा, जहां कोई संदेह देखने को नहीं मिला। भारतीय नागरिकों के बीच चीन के प्रति स्पष्ट रूप से अविश्वास देखने को मिला और वह नहीं चाहते हैं कि देश में अत्यधिक चीनी निवेश हो।

उत्तरदाताओं में से केवल 10.3 प्रतिशत चाहते हैं कि विदेशी निवेश को मुक्त बाजार मार्ग के तहत मुक्त प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए। लगभग 56 प्रतिशत उत्तरदाता चाहते हैं कि भारत संरक्षणवादी हो और विदेशी निवेश पर प्रतिबंध और नियंत्रण लगाए, जबकि 31.2 प्रतिशत चाहते हैं कि भारत आंशिक रूप से सख्त नियमों के साथ विदेशी निवेश की अनुमति दे।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत दुनिया में विदेशी निवेश के सबसे बड़े प्राप्तकर्ताओं में से एक बन गया है। लगभग 72 प्रतिशत भारतीयों ने इसे एक सकारात्मक विकास पाया, जबकि 11.4 प्रतिशत ने इसे नकारात्मक तौर पर देखा, वहीं 16 प्रतिशत ऐसे लोग भी रहे, जो कि दोनों ही विचारों को कहीं न कहीं सही मान रहे थे। करीब 80 फीसदी लोगों का यह भी मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने में सफल रही है, लेकिन इसके साथ ही, अधिकांश उत्तरदाता चाहते हैं कि भारत विदेशी निवेश से निपटने के दौरान एक संरक्षणवादी नीति अपनाए।

उत्तरदाताओं से पूछा गया कि क्या बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने रोजगार के अवसर पैदा करने और श्रमिकों के लिए बेहतर काम करने की स्थिति बनाने में मदद की है। इस पर 43 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने आश्चर्यजनक रूप से अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सहमति व्यक्त की, जबकि 52 प्रतिशत के करीब लोगों की ²ढ़ राय थी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने श्रमिकों का शोषण करती हैं।

ट्रैकर ने दिखाया कि अधिकांश भारतीय भारत में विदेशी निवेश का स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही, उन्हें लगता है कि कुछ प्रमुख क्षेत्रों में विदेशी निवेशकों का दबदबा देश के लिए खतरनाक है।

हालांकि, 48.6 प्रतिशत भारतीय मनोरंजन क्षेत्र में भी विदेशी निवेशकों का दबदबा बेहद खतरनाक मानते हैं, जिसमें फिल्में, ओटीटी प्लेटफॉर्म और टीवी चैनल शामिल हैं।

जहां सर्वे में शामिल 47 प्रतिशत से अधिक भारतीयों ने पाया कि दूरसंचार, मोबाइल और इंटरनेट क्षेत्र में विदेशी निवेशकों का दबदबा बेहद खतरनाक है, वहीं कंज्यूमर ड्यूरेबल्स क्षेत्र में लगभग 32 प्रतिशत ने इसी प्रकार की राय व्यक्त की। कृषि क्षेत्र में भी, सर्वे में शामिल 45.5 प्रतिशत भारतीयों ने विदेशी निवेशकों का दबदबा बेहद खतरनाक पाया। निष्कर्ष स्पष्ट है। भारतीय विदेशी निवेश का स्वागत तो करते हैं, लेकिन वे नहीं चाहते कि यह भारतीय उद्यमियों को दरकिनार करते हुए भारतीय बाजार पर पूरी तरह हावी हों।

देश भर में हाल ही में किए गए सीवोटर सर्वेक्षण से पता चला है कि अधिकांश भारतीयों के बीच मजबूती से चीन विरोधी भावनाएं पनप रही हैं। एक सवाल पूछा गया कि क्या वे भारतीय कंपनियों में चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर भरोसा करते हैं। इस सवाल पर 90 प्रतिशत से अधिक भारतीयों ने कहा कि वह इस पर विश्वास नहीं करते हैं, जबकि केवल 9 प्रतिशत लोगों ने ही चीनी एफडीआई में विश्वास व्यक्त किया। इसके विपरीत, जब अमेरिकी एफडीआई के बारे में इसी तरह का सवाल पूछा गया था, तो सिर्फ 40 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं कहा, जबकि 57 प्रतिशत नागरिकों ने विश्वास व्यक्त किया।

सर्वे में शामिल लोगों से चीन से जुड़ा एक और सवाल किया गया कि क्या चीनी एफडीआई पर प्रतिबंध से भारत के हितों को नुकसान होगा, जिस पर करीब 66 फीसदी ने कहा कि भारतीय हित प्रभावित नहीं होंगे, जबकि 32 फीसदी ने कहा कि इसका विविध प्रभाव हो सकता है।

ऐसा लगता है कि भारतीयों का भारी बहुमत जी नेटवर्क के संस्थापक सुभाष चंद्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका को एक विदेशी निवेश फर्म इनवेस्को के साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई में समर्थन देता है, जो पुनीत गोयनका और प्रमुख प्रबंधन टीम को बाहर करना चाहता है और जी नेटवर्क को चलाने के लिए एक नया जेम बनाना चाहता है। आम भारतीयों की भावनाओं का आकलन करने के लिए सीवोटर द्वारा किए गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से पूछा गया कि क्या वे गोयनका को प्रबंध निदेशक के पद से हटाने के लिए वोट देने में सक्षम बनाने के लिए जल्द से जल्द एक असाधारण आम बैठक बुलाने की इनवेस्को की मांग का समर्थन करते हैं। इस पर लगभग 85 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे इनवेस्को के कदम का विरोध करते हैं, जबकि उनमें से करीब 12 प्रतिशत लोगों ने इस कदम का समर्थन किया।